Wednesday, December 31, 2008

तुम्हें देख बंद उसका कहीं द्वार हो न जाय ।

सम्हलो की चूक पहली
इस बार हो न जाए ।
सब जीत ही तुम्हारी
कहीं हार हो न जाए ।।

हर पग सम्हाल के रखना
बाहर हवा विषैली
नाजुक है बुद्धि तेरी
बीमार हो न जाय ।

अनुकूल कौन सा तुम
मौका तलाशते हो
जागो, कहीं तुम्हारी
भी पुकार हो न जाए ।

हर रोज जिंदगी को
रखना चटक सुगन्धित
गत वर्ष का पुराना
अखबार हो न जाय ।

खोना न होश दौडे
जिस घर में जा रहे हो
तुम्हें देख बंद उसका
कहीं द्वार हो न जाय ।

सच्चा शरणम और रम्य रचना के नव कलियों का उत्साह देख यह कविता लिख दी है । हिमांशु ने आग्रह भी किया था, और मुझे वर्षांत में लिखना अच्छा लगा ।

Saturday, November 15, 2008

सवेरा आने वाला है

आज अस्वस्थता ने साथ छोड़ा है । चिट्ठे के प्रारम्भ से ही अस्वस्थता ने पकड़ लिया। अब कुछ निवृत्त हुआ- अब लिखूंगा। आज दो प्रविष्टियाँ पढी - एक 'मुंह की कालिख को पोंछ उंगली से गाल का तिल बना दिया तुमने', और दूसरी 'कुछ कुछ तो होता ही है'। इन की पढ़न से शुरुवात हो गयी है, अब लिखूंगा। अभी एक खड़ी बोली की कविता लिख रहा हूँ, तदन्तर लोक भाषा का यह चिटठा गतिशील रहेगा -

"मत फुफुकारो नाग, सपेरा आने वाला है ।
बोलो बोलो काग, सवेरा आने वाला है ॥

पिय ने भेंजी रसगर पाती ।
ले सहेज सब क्या सकुचाती।
जल्दी सजा सुहाग, चितेरा आने वाला है॥

यह सारे है सदन न तेरा ।
चार दिनों का रैन बसेरा।
जाग बावरे जाग, लुटेरा आने वाला है ॥

सपना कब अपना होता है ।
कंचन को तपना होता है ।
जलने देना आग,अँधेरा आने वाला है॥

Sunday, October 12, 2008

टपकि जईहैं हो हमरे आँखी से लोरवा ।।

जहिया पिअइहैं न बछरू के गइया
मरी जइहें बचवा जे खींचै बकइयाँ
कवनो सुहागिन कै फुटिहैं सिन्होरवा -
टपकि जईहैं हो हमरे आँखी से लोरवा ।।

हरिअर घसिया में लगिहैं जो आगी
पानी ले ले बदरा अकसवै में भागी
सुगिआ मिलइहैं न सुगवा से ठोरिया-
टपकि जईहैं हो हमरे आँखी से लोरवा ।।

जहिया बिछुरि जइहैं मितवन क टोली
सुनबै न बचवन की तोतरि बोली
असमय में झरि जइहैं आमे क टिकोरवा-
टपकि जईहैं हो हमरे आँखी से लोरवा ।।

जेहि दिन जिनिगिआ क ई रंग उतरी
सुख होइहैं सपना उलटि जइहैं पुतरी
पंकिल बिछुरि जइहैं माई कै कोरवा -
टपकि जईहैं हो हमरे आँखी से लोरवा ।।