Sunday, October 12, 2008

टपकि जईहैं हो हमरे आँखी से लोरवा ।।

जहिया पिअइहैं न बछरू के गइया
मरी जइहें बचवा जे खींचै बकइयाँ
कवनो सुहागिन कै फुटिहैं सिन्होरवा -
टपकि जईहैं हो हमरे आँखी से लोरवा ।।

हरिअर घसिया में लगिहैं जो आगी
पानी ले ले बदरा अकसवै में भागी
सुगिआ मिलइहैं न सुगवा से ठोरिया-
टपकि जईहैं हो हमरे आँखी से लोरवा ।।

जहिया बिछुरि जइहैं मितवन क टोली
सुनबै न बचवन की तोतरि बोली
असमय में झरि जइहैं आमे क टिकोरवा-
टपकि जईहैं हो हमरे आँखी से लोरवा ।।

जेहि दिन जिनिगिआ क ई रंग उतरी
सुख होइहैं सपना उलटि जइहैं पुतरी
पंकिल बिछुरि जइहैं माई कै कोरवा -
टपकि जईहैं हो हमरे आँखी से लोरवा ।।

2 comments:

शोभा said...

आपका स्वागत है.

प्रदीप मानोरिया said...

बहुत सार्थक रचना बधाई आपका चिठ्ठा जगत में स्वागत है निरंतरता की चाहत है
बधाई स्वीकारें मेरे ब्लॉग पर भी पधारें